zebrafish

Daily News

जेब्राफिश

09 Jan, 2023

चर्चा में क्यों ?

हाल ही में भारतीय वैज्ञानिको ने अपने शोध में बताया की जेब्राफिश में पाया जाने वाला प्रोटीन, मानव के मेरुदण्ड अस्थिखण्ड में उम्रदराज डिस्क को फिर से पैदा कर सकता है

मुख्य बिंदु :-

  • जेब्राफिश की रीढ़ की हड्डी में पाया जाने वाला एक प्रोटीन, जो डिस्क रखरखाव में सकारात्मक भूमिका निभाता है और मेरुदण्ड अस्थिखण्ड में उम्रदराज डिस्क को फिर से पैदा करने को बढ़ावा देता है, में कमजोर पड़ चुके मानव डिस्क फिर से पैदा करने की प्रक्रिया को बढ़ावा देने संबंधी चिकित्सीय प्रभाव के मौजूद होने की संभावना हो सकती है।

वर्तमान उपचार -

  • मनुष्यों में, डिस्क स्वाभाविक रूप से कमजोर पड़ जाती है, जिससे पीठ के निचले हिस्से, गर्दन और उपांग में दर्द सहित कई संबंधित स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं होती हैं।
  • वर्तमान में, कमजोर पड़ चुके डिस्क के लिए केवल रोगसूचक उपचार उपलब्ध हैं, जिनमें दर्द निवारक या सूजन-रोधी दवाएं शामिल हैं।
  • गंभीर मामलों में डिस्क विस्थापन या डिस्क फ्यूजन सर्जरी की जाती है। इस प्रकार, कमजोर होते डिस्क की गति को कम करने या मनुष्यों में डिस्क को फिर से पैदा करने पर आधारित एक उपचार प्रक्रिया को विकसित करने की तत्काल आवश्यकता है।
  • चिकित्सा परीक्षण मानव डिस्क के कमजोर होते जाने के चरणों से सम्बंधित आवश्यक जानकारी प्रदान करते हैं, लेकिन डिस्क के रखरखाव में भूमिका निभाने वाली कोशिका और आणविक प्रक्रियाओं के बारे में सीमित जानकारी उपलब्ध है।
  • सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि कमजोर होते डिस्क की गति को कम करने या मनुष्यों में डिस्क को फिर से पैदा करने पर आधारित कोई चिकित्सा प्रक्रिया या उपचार ज्ञात नहीं है।

फैक्टर 2A प्रोटीन

  • विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग के स्वायत्त संस्थान, आगरकर रिसर्च इंस्टीट्यूट (एआरआई), पुणे द्वारा किए गए एक अध्ययन में पता चला है कि अंतर-मेरुदंड डिस्क कोशिकाओं से स्रावित कोशिका कम्युनिकेशन नेटवर्क फैक्टर 2A (CCN2A) नामक एक प्रोटीन, कमजोर व उम्रदराज होते डिस्क में डिस्क को फिर से पैदा करने को उत्प्रेरित करता है तथा इसके लिए FGFR 1-SHH (फाइब्रोब्लास्ट ग्रोथ फैक्टर रिसेप्टर-सोनिक हेजहोग) पाथवे नामक तरीके को संशोधित करके कोशिका प्रसार करता है और कोशिका को संरक्षित करता है।
  • एक मॉडल जीव के रूप में ज़ेब्राफिश का उपयोग करने वाला यह अध्ययन विवो अध्ययन में पहला है, जो दिखाता है कि अन्तःविकसित सिग्नलिंग कैस्केड को सक्रिय करके कमजोर व उम्रदराज होते डिस्क में डिस्क को फिर से पैदा करने को उत्प्रेरित करना संभव है।
  • वैज्ञानिकों ने यह भी पाया कि CCN2A- FGFR 1-SHH, सिग्नलिंग कैस्केड डिस्क के रखरखाव और डिस्क को फिर से पैदा करने की प्रक्रिया में सकारात्मक भूमिका निभाता है।
  • जर्नल, डेवलपमेंट में प्रकाशित इस अध्ययन में आनुवांशिकी और जैव-रसायन दृष्टिकोण का उपयोग किया गया है और यह डिस्क के कमजोर होती प्रक्रिया की गति को धीमा करने या कमजोर हो चुके मानव डिस्क में डिस्क को फिर से पैदा करने की प्रक्रिया को उत्प्रेरित करने के लिए एक नई रणनीति तैयार करने में मदद कर सकता है।

जेब्राफिश के बारे में

  • ज़ेब्राफिश (डैनियो रेरियो) दक्षिण एशिया की एक छोटी, उष्णकटिबंधीय मछली प्रजाति है। वे एक्वैरियम व्यापार में लोकप्रिय हैं और उनके आसान रखरखाव, कम पीढ़ी के समय और पारदर्शी भ्रूण के कारण वैज्ञानिक अनुसंधान में भी उपयोग किया जाता है, जो उन्हें विकास और बीमारी का अध्ययन करने के लिए उपयोगी बनाता है।
  • ज़ेब्राफिश छोटी होती है, आमतौर पर लगभग 2.5 से 3.5 सेमी (1 से 1.5 इंच) की लंबाई तक बढ़ती है।
  • उनके शरीर पर एक विशिष्ट धारीदार पैटर्न होता है, जिसकी वजह से उनको नाम दिया गया है।
  • जेब्राफिश सर्वाहारी हैं, जिसका अर्थ है कि वे पौधों और छोटे जानवरों दोनों को खाती है, और वे अपने स्कूली व्यवहार(एक साथ किर्याकलाप) के लिए जाने जाते हैं, जहां वे बड़े समूहों में तैरते हैं।
  • वैज्ञानिक अनुसंधान में, ज़ेब्राफिश का उपयोग विकास, आनुवंशिकी, रोग और विकास सहित विषयों की एक विस्तृत श्रृंखला का अध्ययन करने के लिए किया जाता है।
  • उनका उपयोग मानव रोगों जैसे कैंसर, हृदय रोग और मधुमेह के मॉडल के लिए किया गया है, और शरीर पर दवाओं और अन्य पदार्थों के प्रभावों का अध्ययन करने के लिए भी इसका उपयोग किया गया है।

संरक्षण स्थिति –

  • प्रकृति के संरक्षण के लिए अंतर्राष्ट्रीय संघ IUCN रेड लिस्ट के अनुसार, zebrafish (Danio rerio) को "कम चिंता" की प्रजाति के रूप में वर्गीकृत किया गया है, जिसका अर्थ है कि वे वर्तमान में विलुप्त होने के एक महत्वपूर्ण जोखिम का सामना नहीं कर रहे हैं।
  • ज़ेब्राफिश व्यापक रूप से दक्षिण एशिया में अपनी मूल सीमा में वितरित की जाती हैं, और वे कई क्षेत्रों में आमरूप से पायी जाती हैं। अपितु उन्हें स्थानीय खतरों का सामना करना पड़ सकता है, जैसे निवास स्थान का नुकसान या प्रदूषण, फिर भी उनकी समग्र आबादी स्थिर है और उन्हें वर्तमान में विलुप्त होने का खतरा नहीं माना जाता है।

Source - PIB

Nirman IAS (Surjeet Singh)

Current Affairs Author